Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यथा यथा पुनः शोषमुपयाति न विभ्रमैः ।
देहसत्तामनादृत्य यथा भूतार्थदर्शनात् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्य देह की सत्ता का अनादर कर उसमें स्थित तात्त्विक वस्तु का
प्रत्यक्ष करे, फिर उससे होनेवाले लज्जा, भय, विषाद, ईर्ष्या, सुख, दुःख आदि के ऊपर
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