Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
ज्ञानात्मिकैव प्रतिभा ज्ञप्तिरेवाखिलं जगत् ।
ज्ञप्तिरप्यात्मतत्त्वश्रीः परिज्ञातोपशाम्यति ॥ ४० ॥
ज्ञेयाभावे त्वनिर्वाच्या शिष्यते शाश्वतं शिवम् ।
अशरीराद्यविश्वात्म सर्वं शान्तमिदं ततम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें आत्मतत्त्वरूप श्री प्रतिबिम्बित है ऐसी ज्ञप्ति यानी चिदाभासरूप
ज्ञान तब होता है, जब कि आत्मा का तत्त्वज्ञान पहले नहीं रहता, इसलिए उसको
प्रत्यगात्ममात्रस्वरूप जान लेने पर वह स्वयं नष्ट हो जायेगी, क्योकि उस समय आत्मतत्त्व से
अलग करनेवाली कोई उपाधिभूत वस्तु अलग नहीं रहेगी । ठीक ही है, दर्पण में देखी गई
मुखशोभा दर्पण के हट जाने पर स्वयं ही शान्त हो जाती है । जब उपाधि शान्त हो जाती
है तब ज्ञप्ति का स्वरूप नहीं कहा जाता । उस समय सदा स्थायी शिवस्वरूप एकमात्र आत्मा
ही अवशिष्ट रहता है । यह शिवस्वरूप वस्तु शरीर आदि अवयवो से रहित जगद्रूप से निर्मुक्त
पूर्ण, शान्त, ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञप्तिरूप त्रिपुटी से शून्य, पत्थर की चानं के सदुश वाणी के
व्यापारं से वर्जित है ओर यह सारा प्रपंच तद्रूप ही है