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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

वसन्तरसपूरस्य यथा विटपगुल्मता । स्वरूपमात्रभरितसंविदः सर्गता तथा ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

द्रष्टा के द्ृश्यस्वरूप न होने पर भी व्यवहार में दरश्यसत्ता की स्यति का निवाह्कि व्रष्टाहो सकता है, यह द्ष्टान्त द्वारा दिखलाते हैं जैसे वसन्त ऋतु के रस का प्रवाह ही वृक्ष, गुल्म आदिरूप है वैसे ही एकमात्र अपने स्वरूप से ही परिपूर्ण बना देनेवाली आत्मसंवित्‌ ही सृष्टि है