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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

यदिदं जगदाभासं शुद्धं चिन्मात्रवेदनम् । कात्रैकता द्विता का वा निर्वाणमलमास्यताम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

रन्त॒ परमार्थ में तो द्रष्टा के ग्राथ ऐक्य की सम्भावना भी नहीं है, यह कहते हैं / जो यह जगत्‌ का आभास है वह सब विशुद्ध चिन्मात्र वेदनरूप ही है । इसमें क्या एकत्व या क्या द्वित्व हो सकता है। इसलिए हे श्रीरामजी, आप पूर्णरूप से निर्वाणस्वरूप से स्थित रहिये