Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
जगद्गन्धर्वनगरगुरुगर्वेण नश्यथ ।
सुखरूपाणि दुःखानि नाशनायैव पश्यथ ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सभ्यपुरुषों, जगद्रूपी गन्धर्वनगर में
विवेक को नष्ट कर देनेवाले गर्व से आप लोग नष्ट न हो जायें । अपने को नष्ट कर देने के लिए ही
स्थित इन सुखस्वरूप सांसारिक पदार्थों को आप लोग दुःखरूप ही देखें