Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
रूपालोकमनस्कारमृगतृष्णाम्बुपायिनः ।
व्यर्थमायासमायूंषि मा मा क्षपयतैणकाः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे बाह्य
तथा आभिमानिक भोगरूपी मृगतृष्णाजलका पान करनेवाले मृगो, तुम लोग व्यर्थ का परिश्रम
उठाकर अपनी आयु मत गँवाओ, मत गँवाओ