Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अज्ञावबुद्धः संसारः स हि नास्ति मनागपि ।
अवशिष्टं च यत्सत्यं तस्य नाम न विद्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानीजन ही इस संसार
को सत्य समझते हैं । वस्तुतः वह कुछ भी नहीं है । अवशिष्ट जो सत्यवस्तु है उसका तो नाम भी
नहीं है