Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
त्रोटयित्वा तु तृष्णायःशृङ्खलावलितं बलात् ।
संसारपञ्जरं तिष्ठ सर्वस्योर्ध्वं मृगेन्द्रवत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णारूपी लोहे की श्रृंखला से वेष्टित संसाररूपी पिंजरे को आत्मज्ञान के बल से
जबरदस्ती तोड़कर सिंह के समान सबके ऊपर स्थित रहिये