Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
आत्मात्मीयग्रहभ्रान्तिशान्तिमात्रा विमुक्तता ।
यथा तथा स्थितस्यापि सो स्वसत्तैव योगिनः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
भै" ओर "मेरा" इस अभिमानरूप
भ्रान्ति की एकमात्र शान्ति ही मुक्ति है । इसके सिवा और कोई दूसरी वस्तु मुक्ति नहीं है । तथा
जिस किसी रूप से स्थित योगी की वह अपनी सत्ता ही है