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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

निर्दग्धतृणभस्माली क्वापि याति यथानिलैः । सतां स्वभावविश्रामैः क्वापि याति तथा जगत् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे खूब जला दिये गये तृणों की भस्म का ढेर वायु से उड़कर न जाने किस जगह पर चला जाता है, वैसे ही आत्मस्वरूप मेँ विश्राम करनेवालों की संगति से ज्ञान प्राप्तकर सज्जन पुरुषों का यह जगत्‌ न जाने कहाँ चला जाता है