Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
जगद्ब्रह्मपदार्थस्य संनिवेशः स तूत्तमः ।
ब्रह्मशब्दार्थरूपात्मा न जगच्छब्दकार्यभाक् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मपद का जो बंहणरूप (वर्द्धनशील) अर्थ है उसी का आकारविशेष जगत् है । वह आकारविशेष
यदि ब्रह्मशब्द का मुख्यार्थरूप आत्मा ही यानी निर्विकल्प-स्वप्रकाश-निरतिशयानन्द प्रत्यगात्मा
ही है, तब तो वह “जगत्” शब्द का अर्थ बहुत उत्तम है । किन्तु "गच्छति -षड्विधविकारैः
परिवर्तते - इति जगत्" यानी छः तरह के विकारों से जो सदा परिवर्तित होता है उसे जगत्
कहते हैं इस तरह की व्युत्पत्ति से "जगत्" शब्द का अर्थ यदि विकारात्मक कार्यो का भागी
किया जाता है, तो फिर वह अर्थ उत्तम नहीं है