Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन सांग्रारिक पदार्थों का अनुभव तत्वज्ञानियों को जैसा होता हैं कैसा यूर्खों को नहीं और मूर्खो
के जै होता हैँ कैला तत्वज्ञानियों को नहीं यह जो ऊपर कहा ग्या हैं, उसका तामे
अतिपादित भगवान् श्रीकृष्ण के वचन से मेल दिखलाते हैं /
भद्र, आत्मा का यथार्थ ज्ञान अज्ञानियों के लिए एक तरह की रात ही है, क्योकि जैसे अन्धेरी
रात प्रकाशरूप नहीं रहती, वैसे ही अज्ञानियों के प्रति आत्मा का ज्ञान भी प्रकाशरूप नहीं रहता।
इस तरह की जो आत्मविद्यारूपी रात है उसमें जितेन्द्रिय तत्त्वज्ञ पुरुष जागता रहता है यानी
आत्मविद्या के लिए तत्त्वज्ञ पुरुष निरन्तर ऐसे सावधान रहता है कि उसमें से क्षणभर के लिये भी
च्युत नहीं होता । और जिस द्वैतबुद्धिरूप अज्ञानदशा में प्राणी व्यवहार करते हैं वह तत्वज्ञ मुनि के
लिए रात हे, क्योकि ज्ञानी के प्रति उसका प्रकाश ही नहीं रहता