Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
मृन्मये द्विषति ज्ञानाद्द्विषद्भावभये यथा ।
यथासंख्यं स्थिते एव ज्ञस्यार्थमनसी सदा ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में अर्थ और
मन दोनों पारमार्थिक ब्रह्मस्वभाव से ही स्थित हे । वे जिस सांसारिक मिथ्यारूप से स्थित थे उस
रूप से विलक्षण पूर्णानन्दात्मक पारमार्थिक सत्स्वरूप से ही स्थित हैं