Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
किमप्यपूर्वमेवान्यत्संपन्ने भावरूपिणि ।
संहितार्थजगत्कालोऽप्यज्ञोऽज्ञविषयोऽप्यसत् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ की दृष्टि से
सुखादि भोग एवं जगत् को कार्य-कारणरूप से जुटा देने में समर्थ काल, कालकृत जन्मादिविकार,
भोगकर्ता एवं अज्ञो के शब्दादि विषय-ये सब ऐसे असत् हैं, जैसे समीप में सोये हुए पुरुष का स्वप्न
ओर अधीर बालक को सामने भास रहा यक्ष