Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
स्थितं बोधमनाद्यन्तं स्वभावं सर्गगं विदुः ।
मनः शब्दार्थरहितं विभागान्तविवर्जितम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य अर्थो कहे गये जानने के प्रकार को आभ्यन्तर मानिक आर्थो में और समझना चाहिए,
यह कहते हैं /
और मन के शब्दार्थ से रहित (मानसिक ज्ञान के अविषय) कालादि विभागकृत परिच्छिननता
से वर्जित बोधरूपी जल मन एवं बुद्धिरूपी तरंगों से युक्त-सा प्रतीत होता है, परन्तु वह निर्मल ही
ही है और इसीको प्रपंचगत स्वभाव समझते हैं