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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

बोधवारिमनोबुद्धितरङ्गमिव निर्मलम् । क्व संभवत एवान्तः के वार्थमनसी किल ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह विस्तार के साथ अज्ञानी और तत्त्वज्ञानियों के जयत्‌-ज्ञान के जो दो प्रकार दिखलाये गये हैं; उनमें यथार्थूप होने के कारण द्वितीय प्रकार ही उपादेय हैं, यह कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, शुद्ध आत्मा के भीतर संसार के पदार्थों तथा मन का संभव कहाँ है अथवा वे हैं ही क्या इस मन तथा जगत्‌ के विषय में उत्पन्न हुई भ्रान्ति बिलकुल निरर्थक है । इसलिए आपसे यही कहना है कि आप ब्रह्मस्वभाव में स्थित रहिये