Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
ज्ञेयं रज्जुरिवाशेषं स्वभावे तिष्ठ चिद्घने ।
ज्ञप्तिरेवान्तरं बाह्यं चार्थत्वमधितिष्ठति ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य ओर आभ्यन्तर पदार्थों के स्वरूप को ज्ञप्ति ही धारण
करती है, जैसे कि बीज शाखा तथा फल आदि के स्वरूप को धारण करता है । अतः हे श्री
रामचन्द्रजी, बतलाइये तो सही, ऐसी स्थिति में अर्थ और मन कहाँ रहे ?