Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
बीजं शाखाफलानीव क्वातोऽर्थमनसी वद ।
ज्ञेयासंभवतो ज्ञप्तिरप्यनाख्यं पदं गता ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञेय पदार्थो के
अभाव से ज्ञप्ति (बुद्धि या वृत्ति) भी अनिर्वचनीय पदको प्राप्त हो चुकी है । इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी,
सम्पूर्ण विशेषं से शून्य स्वयंप्रकाश सद्रूप आत्मा ही शेष है