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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

मन एवार्थसंस्कारः स चाभावात्मको भ्रमः । सर्वात्मत्वादजस्यैतदप्यकारणकं मनः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

तब ऐसी दशा में जग्रत्‌ के पदार्थ ओर मन वे दोनों तत्वतः क्या है / इस पर कहते हैं ब्रह्म के सम्पूर्ण वस्तुओं की आत्मा होने से कारणशून्य इस मनरूप से वही भासता है ओर भ्रम के अनुभव से पदार्थ भी मिथ्या ही भासता है