Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
भ्रमानुभवतोऽर्थश्च मिथ्यैवास्तीव भासते ।
अकारणकमेवार्थनिर्भासं भासते मनः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जैसे कारणरहित अर्थों
का प्रकाश होता है वैसे ही कारण रहित ही मन भी भासता है । बिजली की चमक के तुल्य
अस्थिर यह मन इधर-उधर अपनी चंचलता प्रकट करता है