Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
विद्युद्विलसिताकारमस्थिरं तरलायते ।
त्वं मनस्कारमात्रात्मा संसृतौ विभ्रमायसे ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, एकमात्र
मन का स्वरूप होकर आप भी इस संसार में भ्रान्त-से हो रहे हैं एक आत्मस्वभाव का यदि
आप परिज्ञान कर लेते हैं, तब तो आप न मनरूप हैं ओर न भ्रान्त-से ही हो रहे हैं