Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
स्वभावैकपरिज्ञानान्नासि नापि भ्रमायसे ।
मनसैव हि संसार आत्मबोधेन शाम्यति ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
निश्चित है कि मन से ही यह संसार उत्पन्न होता है और आत्मज्ञान से शान्त हो जाता है ।
सीप में चाँदी के भ्रम के आकार का मनुष्य झूठ-मूठ में दुःख उठाता है