Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
शुक्तिरूप्यभ्रमाकारो जनो मिथ्यैव ताम्यति ।
अभावभावस्तु परं बोधरूपमसंसृतिः ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु ज्ञान ही
परमात्मा का असली स्वरूप है और संसार का अभाव भी ज्ञानरूप ही है । निर्वाण से भिन्न
"अहम्" यह भ्रमरूप सत्ता तो एकमात्र दुःख के लिए ही है