Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
तथैकममलं ज्ञात्वा ज्ञानज्ञेयदशास्वपि ।
घृतेनात्मा घनीभूय पाषाणीक्रियते यथा ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घनीभूत होकर घी अपने को
पाषाणरूप कर लेता है ऐसे ही चेतन विषयरूप होकर अपने को चित्तरूप करता है