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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

अबुद्धो नीयते न्यायैरेकमेवैष सुस्थितः । अत्र यद्यप्यबोधादेः संभवो नास्ति कश्चन । तथापि कल्प्यतेऽत्रैव बोधनाय परस्परम् ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

शुद्ध चिदात्मा में यद्यपि अज्ञान आदि का कोई संभव नहीं है, तथापि अज्ञानकाल में एक दूसरों को बोध देने के लिए यह सब कल्पना की जाती है