Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

भ्रममात्रमहं मिथ्यैवेति बुद्ध्वा विभावयन् । यक्षोऽयक्षत्वमायाति चित्तं चित्तत्त्वतामिदम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

यक्ष के अपने कल्पित देह, नयर आदि के उयसहार की तरह जगद्रूप के बाध मे भी उसे एकमात्र निथ्यारूप देखना ही लु है, यह कहते हैं / जैसे यह सब कुछ एकमात्र मेरा भ्रम है, और कुछ नहीं यों विचार करता हुआ यक्ष अयक्ष हो जाता है वैसे ही अहमादि सब जगत्‌ मिथ्या ही है यों जानकर यह चित्त चिद्रूप तात्त्तिकभाव को प्राप्त हो जाता है