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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

इत्यसौ ज्ञानविटपी लतापल्लवपुष्पवान् । भविष्यज्ज्ञानफलदो दिनानुदिनमुत्तमः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजन्द्रजी, लता, पल्लव तथा पुष्पों से सुशोभित इस तरह का यह उत्तम ज्ञानरूपी वृक्ष (समाधिरूपी वृक्ष) दिन-पर-दिन भविष्यत्‌ काल में मूलअज्ञान के उच्छेदक ब्रह्मसाक्षात्काररूपी ज्ञान का प्रदाता होता है, जिससे कि सप्तम भूमिका तक विश्रान्ति प्राप्त हो जाय