Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
स्वात्मलग्नाभिलाषांशदंशदोषैरुपद्रुतः ।
भोगलोभलसन्मोदशृगालचिरविद्रुतः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी आत्मा में संलग्न अनेक अभिलाषारूपी मच्छर इसे काट-खाते हैं और यह भी
उनके भय से वेगपूर्वक आगे भाग रहा है