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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

स्वकर्मकर्तृतोद्भान्तदारिद्र्यद्वीप्यनुद्रुतः । व्यामोहमिहिकान्धत्वकूटावटलुठत्तनुः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह तो अपने ही कर्म ओर कर्तृता के फर में पड़कर उद्भ्रान्त हो गया है, फिर भी एक दारिद्रयरूपी व्याघ्र इसके पीछे लगा है । स्त्री, पुत्र आदि में आसक्ति रूपी व्यामोहमिहिका से अन्धा बना देनेवाले कुहरे से अन्धा होकर कपटरूपी पर्वत की चोटियों पर चढते समय नीचकृत्यरूपी गङ्ख मे गिर जाने से इसका शरीर भग्न हो गया है