Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
तारुण्यनारीसुहृदा क्षणमालिङ्ग्य वर्जितः ।
दुःसंचारेषु पवनैः कुपितैरिव वर्जितः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्त्री के लिए बने हुए युवावस्थारूपी प्रियमित्र ने क्षणभर इसका आलिंगन कर
इसे फिर छोड दिया है । झंझावात के सदृश कुपित इन्द्रियों न दुर्गम नरक लोक तथा स्थावर आदि
योनिरूप अनेक जंगलों मे ले जाकर इसे बार-बार फेंक दिया है