Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
कदाचिन्निर्वृतिं याति सशमं च तरौ क्वचित् ।
मनोहरिणको राजन्नाजीवमिव भास्वति ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, इस तरह का यह
मनरूपी मृग अनेक जन्मों के संचित पुण्य के उदय से कभी अधिकारी शरीर मेँ शम आदि साधनों
से युक्त होने पर इस पूर्वोक्त समाधिरूपी वृक्ष के नीचे विश्रान्तिसुख को ऐसे प्राप्त करता है, जैसे
रात मेँ शीत तथा अन्धकार से पीडित प्राणी सूर्य का उदय होने पर