Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
समाधिबीजं संसारनिर्वेदः पतति स्वयम् ।
चित्तभूमौ विविक्तायां विवेकिजनकानने ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह संसार का
परम वैराग्यरूप समाधि का बीज विवेकीजनरूपी जंगल में विवेकज्ञान से परिष्कृत चित्तरूपी भूमि
में अपने ही आप जाकर गिरता है