Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
पुत्रदारसमग्राणि मित्राणि च धनानि च ।
जन्मान्तरकृतानीव स्वप्नजानीव पश्यति ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
पुत्र, सत्री, मित्र तथा धन आदि सभी पदार्थों को यह जन्मान्तर में प्राप्त
किये गये या स्वप्न में पैदा हुए के समान देखता है