Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
व्यवहारेषु कार्येषु भोगसंपादकेष्वपि ।
परमुद्वेगमायाति सनिद्र इव बोधितः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सोया हुआ पुरुष किसी से जगा दिये जाने पर निद्रासुख के
विच्छेद से उद्वेग को प्राप्त हो जाता है वैसे ही भोगदायक अवश्य कर्तव्य व्यवहारो मेँ भी वह योगी
दूसरों के द्वारा समाधिरूपी निद्रा से जगा दिये जाने पर समाधिसुख के विच्छेद से अत्यन्त उद्वेग को
प्राप्त हो जाता है