Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
दीर्घाध्यग इवोदारामनारतमबाधिताम् ।
चिरं मौर्ख्यश्रमाक्रान्तो विश्रान्तिमभिवाञ्छति ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
बहुत दूर का रास्ता तय करनेवाले पथिक की तरह चिरकालतक के
मूर्खता प्रयुक्त अनेक जन्म-मरण-परम्पराओं में चक्कर लगाते रहने से उत्पन्न श्रम के कारण
अत्यन्त थका हुआ यह पुरुष अति उदार निरन्तर बाधित आत्मविश्रान्ति चाहता है