Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
निःश्वासबोधितोऽप्यग्निरनिन्धन इवात्मनि ।
श्वासमात्रसमोऽप्यन्तरतिष्ठन्नेव शाम्यति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राणधारणमात्र से अन्य पुरुषों के समान भी यह अपने भीतर अहंभाव के अभिमान से बिलकुल
शून्य हो पूर्ण आत्मा में ऐसे शान्त हो जाता है, जैसे निःश्वास से बोधित होने पर भी बिना इन्धन
की अग्नि