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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

घूर्णः क्षीण इवानन्दी सुप्तः संसारवृत्तिषु । अन्तःपूर्णमना मौनी कामपि स्थितिमृच्छति ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

संसार की वृत्तियों में सुप्त, क्षीण उन्मत्त की तरह आनन्दयुक्त तथा भीतर में पूर्ण मनवाला यह मौनी पुरुष किसी अनिर्वचनीय स्थिति को प्राप्त हो जाता है