Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
कुतोऽप्यचेष्टितेष्वेव संप्राप्तेषु विधेर्वशात् ।
भोगेष्वरतिमायाति पान्थो मरुमहीष्विव ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
बिना प्रयत्न किये ही कहीं से यानी दूसरों के प्रयत्न से दैववशात् प्राप्त हुए
भोगों मे यह ऐसे विरक्त हो जाता है, जैसे मरूभूमि में पथिक