Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

ततस्तदखिलां बुद्धिं विहाय वियता समः । गृह्णात्यथास्वादयति भुङ्क्तेऽथ परितृप्यति ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

उस योगी की स्रप्तमभूमिका में कैसी स्थिति रहती है यह बत्लाते है/ तदनन्तर सप्तमभूमिका में प्राप्त आकाश के सदृश वह योगी सम्पूर्ण बुद्धि का (५) परित्याग कर निरतिशय भूमानन्द ब्रह्मभावरूप फल ग्रहण करता है, उसका स्वाद चखता है, उसका भोग लगाता है और उसी से तृप्त होता है (5)