Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ध्यानद्रुमफलं पुण्यौ तदसौ स्वमनोमृगः ।
अधःस्थितः प्रान्तगतं तस्य पश्यति सत्तरोः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
चतुर्थ शूमिका में अक्तभावना दोष का थोड़ा विनाश रहता है और मन्द अन्धकार में घट
आदि की जेस़ी संभावना होती है, वैसी उसमे भी आत्मतत्व की संभावना होती है इससे पहले
चदुर्थ श्रुमिका का द्वार बतलाते हैं /
उस उत्तम ध्यानरूप वृक्ष के नीचे विश्रान्ति ले रहा यह अपना मनरूपी मृग उस मोक्षरूप
ध्यानवृक्षफल को देखता है, जो शाखा के आगे लगा हुआ है