Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
भेदबुद्धिर्विलीनार्थाऽभेद एवावशिष्यते ।
शुद्धमेकमनाद्यन्तं तद्ब्रह्मेति विदुर्बुधाः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिपुटीरूपी अपने अर्थ को विलीन कर भेदबुद्धि अभेदरूप में ही जो अवशिष्ट रह
जाती है यानी त्रिपुटीभेद का साक्षी चेतन ही अपने अर्थों का विलय कर जो शेष रह जाता है,
उसीको विद्वान् लोग आदि और अन्त से रहित शुद्ध एक ब्रह्म कहते हैं