Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
यथाऽप्रकटिताङ्गान्तःसंस्थिता शालभञ्जिका ।
न सती नासती स्तम्भे तथा विश्वस्थितिः परे ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पत्थर या काठ के स्तम्भ में स्थित अप्रकटित अंगोवाली मूर्ति न तो सद्रूप है ओर न असद्रूप ही
है वैसे ही परमात्मा में इस विश्व की स्थिति है