Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
ध्यानं न शक्यते कर्तुं न चैतदुपयुज्यते ।
अबोधेन विबुद्धस्तु स्वयमत्रैव तिष्ठति ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह यह निश्चित है कि बोध होने के
पहले यानी अज्ञानदशा में प्रपंचसहित ब्रह्म में निष्प्रपंच ब्रह्मस्वभाव का अज्ञान होने से उसका
ध्यान नहीं किया जा सकता ओर यह उपयुक्त है भ नहीं । ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर तो स्वयं
ब्रह्मस्वरूप होकर तत्वज्ञानी पुरुष उस ब्रह्म में ही अवस्थित रहता है (तब भला उसका ध्यान वह
कैसे कर कता है 2) कहने का तात्पर्य यह कि सोता या जागता हुआ कोई भी पुरुष अपने में यह
ध्यान नहीं करता कि मैं सो रहा हूँ या मैं सुषुप्त हूँ