Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
स्वभावो दृश्यवैरस्यमेव तत्त्वविदो निजः ।
दृश्यस्पन्दनमेवाहुरतत्त्वज्ञत्वमुत्तमाः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य पदार्थों
मे जो विरक्तिभाव है यानी जड़ता आदि दुःखों के त्यागपूर्वक एकमात्र चिदानन्दैकरस की
स्थिति है वही तत्त्वज्ञानी का अपना ब्रह्मस्वभाव है । दृश्य पदार्थो के स्पन्दन को ही - दृश्य
पदार्थों की ओर चेष्टाशील बनने को ही ज्ञानी महानुभाव लोग अतत्त्वज्ञता (अज्ञान) कहते
हैं