Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अतज्ज्ञायैव विषयाः स्वदन्ते न तु तद्विदः ।
न हि पीतामृतायान्तः स्वदते कटु काञ्जिकम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी को ही संसार के पदार्थ रुचिकर प्रतीत होते हैं, तत्त्वज्ञानी को नहीं । क्योकि
जो अमृतपान कर चुका है, उस प्राणी को कट् मद्य नहीं रुचता