Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
बोधः स्फुरति तृष्णायाः सैव यस्य न विद्यते ।
तस्य स्वरूपमुत्सृज्य क्वासौ तिष्ठति कः कथम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
(वितृष्णस्य' (तृष्णारहित) इस विशेषण का तात्पर्य खोलते हैं ।
आत्मस्वरूपानुसन्धानरूपी ध्यान तो तृष्णादिविक्षेप के कारण ही स्फुरित होता है यह सर्वत्र
प्रसिद्ध है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । किन्तु जिस तत्त्वज्ञानी को तृष्णा ही नहीं है उसके
स्वरूप को छोडकर उसका वह कौन ध्यान कैसे कहाँ रहता है ?