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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

ज्ञस्यानाराधको ध्येयबोधो नयतु यो भवेत् । अनन्ता सा वितृष्णस्य निर्विभागोदितः स्वयम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा ज्ञानी की तृष्णा भी अनन्त है, क्योंकि यह स्वयं विभागरहित अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप से ही उदित है । इसलिए चिन्तनीय बाह्य पदार्थ का जैसा बोध हो, उसे वह चाहे समाधि में लगावे या व्यवहार मे. किन्तु उसकी तृष्णा की पूर्ति में वह समर्थ नहीं है