Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अनन्तमपतृष्णस्य स्वयमेव प्रवर्तते ।
ध्यानं गलितपक्षस्य संस्थानमिव भूभृतः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
पंखरहित पर्वत की स्थिति की
तरह बाह्य पदार्थों मे तृष्णारहित उस ज्ञानी का अनुभवरूप अनन्त ध्यान स्वयं प्रवृत्त होता है,
किसी यत्न की उसे अपेक्षा नहीं होती