Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
शुद्धबोधात्मनि ज्ञत्वादसमाहिततोदिता ।
न जातु सुसमिद्धेऽग्नौ घृतविन्दोरवस्थितिः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
एकमात्र यही कारण है कि जब तक शुद्ध
बोधस्वरूप आत्मा का उदय नहीं हो पाता, तभी तक समाधि के लिए यत्न की अपेक्षा रहती
है । शुद्ध बोधस्वरूप आत्मा के साक्षात् अनुभूत होने पर तो ज्ञानी हो जाने से समाधि के यत्न
की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती, यह तत्त्वज्ञानी महानुभावो की उक्ति है ठीक ही
है, अग्नि के प्रज्वलित हो जाने पर उसमें घृतविन्दु की स्थिति कभी नहीं रह सकती