Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
जगत्तूलः परे शान्ते न जाने क्वाशु गच्छति ।
चित्राग्निनेव बोधेन तेन जाड्यं न शाम्यति ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रान्ति के निवारण में समर्था जो बोध हैं वही मूलअज्ञानकृप जडता के विनाथमेहेतुङः नकि
ऊपरी ज्ञान, यह कहते हैं /
जिस ऊपरी ज्ञान से निर्मूल भी जगत् की भ्रान्ति शीघ्र नष्ट नहीं हो जाती उस ज्ञान से मनुष्य
का अज्ञान ऐसे शान्त नहीं होता, जैसे कि चित्रलिखित अग्नि से मनुष्य का जाड़ा (ठंड)